Monday, May 12, 2014

एयरपोर्ट का समोसा

ज़िन्दगी में हरेक काम हम कभी न कभी पहली बार करते हैं।  इसे बिहार की लोकल भाषा में 'गदहाजन्म छूटना' कहते हैं।  जैसे, अगर आपने पहली बार कंप्यूटर का इस्तेमाल किया, तो इसे कहेंगे कि आपका कंप्यूटर के मामले में गदहाजन्म छूटा। 

लोगों का जब भी किसी मामले में गदहाजन्म छूटता है, तो वो इसे याद रखते हैं।  अब किसी लड़के ने पहली पहली बार चुपचाप कैमरे से किसी अनजान लड़की की फोटो खींच ली।  तो ये वाक़यात उसे याद रहेगा।  मानो उसने कैमरे में लड़की की फोटो ही नहीं, उसका दिल भी कॅप्चर कर लिया है। भले ही वो आगे चलकर न जाने कितनी लड़कियों की फोटो चोरी-छिपे खींचकर अपने आपको कासानोवा समझता रहे, पर पहली फ़तेह उसके दिल और दिमाग पर  हमेशा सचिन की फर्स्ट सेंचुरी की अपना परचम लहराते रहेगी। 

मुझे भी एक मामले में अपना गदहाजन्म छूटना याद है।  जब मैं पहली-पहली बार कई साल पहले एयरपोर्ट गया था।  अब आप सोचेंगे कि मुझे ये घटना इसलिए याद है क्योंकि मैंने पहली बार हवाई जहाज को नज़दीक से देखा, उसपर चढ़ा और कई हज़ार फ़ीट ऊपर हवा में जाकर यात्रा की।  ना, ना मुन्ना ना।  ऐसी सामान्य बातों के लिए मैं किसी घटना को याद नहीं रखा करता।  

मुझे वो एयरपोर्ट इसलिए याद है क्योंकि वहाँ मैंने पहली बार एक ऐसा समोसा देखा जिसकी कीमत एक सौ बीस रुपये थी। शीशे के एक बड़े से जार में ऐसे दर्जनों मूल्यवान समोसे पड़े हुए थे।  मैंने जब उनकी कीमत देखी तो मेरी आँखें खुली की खुली रह गयीं।  

मैंने ताजमहल देखा है। मुझे कुछ वैसा ख़ास नहीं लगा।  मैंने दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में हैदराबाद के निज़ाम की ज्वेलरी देखी है।  एक-एक गहने में लाखों-करोड़ों रुपयों के पन्ने जड़े थे।  पर मेरी साँसें तेज़ नहीं हुईं।  मैंने दुनिया का छठा सबसे बड़ा हीरा देखा है। मेरे मन में 'ओह फक' वाला मंत्र गुंजायमान नहीं हुआ। 

पर एक सौ बीस रुपये के समोसे को देखते ही मेरी धड़कनें रुक गयीं।  क्या ऐसा संभव है? क्या वाकई एक समोसे की कीमत एक सौ बीस रुपये हो सकती है ? ऐसा क्या ख़ास होगा इस समोसे में जो इसे इतना महँगा बना रहा है ? कहीं इसके अंदर हिमालय की दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ तो नहीं? या फिर इसके अंदर सोना-चांदी का चूर्ण तो नहीं भरा हुआ है ?

मैं अपने कुतूहल को ज़ब्त नहीं कर सका।  कांपते हाथों से मैंने सौ का एक और दस के दो नोट समोसे वाले भैया को दिए। उसने कागज़ की एक साधारण सी प्लेट में एक समोसा रखा और मुझे दे दिया।  एक सौ बीस रुपये का समोसा, और वो भी एक साधारण कागज़ की प्लेट में ? मेरे मन में आया कि उस नालायक को बोलूं, "ओये, थोड़ी रेस्पेक्ट करना सीख।  इतना कॉस्ट्ली समोसा  है, कम से कम चांदी के बर्तन में तो दे. " पर मैं कुछ बोल नहीं पाया।  इतने महंगे समोसे को अपने हाथ में पाकर में स्तब्ध था।  

समोसा लेकर मैं चुप-चाप कोने में अपनी चेयर पर गया।  फिर एक-दो गहरी सांसें लेने के बाद आँखें बंद कीं और समोसे में अपने दांत गड़ा दिए।  मुझे पक्का लग रहा था कि इसके स्वाद में ज़रूर ऐसा कुछ अनोखा होगा जिससे में उछल पडूंगा।  पर मैं जैसे-जैसे उस समोसे को चबाता गया, मेरा दिल बैठता गया।  फिल्कुल फीका सा ठंडा समोसा था ये।  

मैंने आँखें खोलीं और समोसे का निरीक्षण किया।  उबले आलू में हल्दी डाली हुई थी।  न हिमालय की दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ थीें, न सोने-चांदी का चूर्ण।  ये सब तो छोडो, मूंगफली का एक बादाम तक नहीं था।  एक सौ बीस रुपये का समोसा अंदर से पूरा चार सौ बीस निकला।  

इस घटना को बीते न जाने कितने साल बीत चुके हैं।  पर उस समोसे का स्वाद अभी तक मुंह में है।  आलू पर हल्दी का रंग अभी भी आँखों में बसा हुआ है। 
क्या था उस समोसे में जिसने उसे इतना महँगा बनाया ? बाज़ार वाले समोसे पांच-सात रुपये में आ जाते हैं, पर उससे हज़ार गुना टेस्टी होते हैं।  इतना वाहियात समोसा एक सौ बीस रुपये का सिर्फ इसलिए हो गया क्योंकि वो एयरपोर्ट में मिल रहा है!

तब मैंने पहली बार सीखा कि लाइफ में प्लेसिंग कितनी ज़रूरी होती है।  अंग्रेज़ी में कहते हैं , "You have to be at the right place." उस मरदूद समोसे ने अपने लिए राइट प्लेस खोज ली थी। 

अब जब भी मेरी इच्छा उस एयरपोर्ट के समोसे को देखने की होती है तो मैं एयरपोर्ट नहीं जाता।  टीवी खोलकर बैठकर जाता हूँ।  बॉलीवुड, पॉलिटिक्स और बिजनेस में न जाने कितने ऐसे ही एयरपोर्ट के समोसे बैठे पड़े हैं।  अंदर सिर्फ उबला आलू और हल्दी है, पर कीमत इसलिए ज़्यादा है क्योंकि इनका जन्म एयरपोर्ट में हुआ या ये किसी तरह एयरपोर्ट पहुँच गए।  

(आलोक रंजन) 


  

Wednesday, November 27, 2013

स्याही या जूता

परसों किसी ने केजरीवाल पर स्याही (इंक) फेंक दी। अब तक जूते फेंकने की परम्परा रही है। स्याही फेंकना एक नए युग की शुरुआत है। 

वैसे देखें तो स्याही फेंकने के कई फायदे हैं जो जूते फेंकने में नहीं है। 

पहला तो यह कि स्याही सस्ती पड़ती है। बीस-तीस रुपयों में एक बोतल आ जाती है। जूते फेंकने में खर्च ज़्यादा आयेगा क्योंकि जब आपको पुलिस पकड़कर ले जा रही होगी तो आप फेंका हुआ जूता तो वापस माँगने नहीं जायेंगे। हाँ, अगर फेंकने के लिए एक एक्स्ट्रा जूता बैग में लेकर आयें तो अलग बात है। पर मामला फिर भी खर्चीला है।

दूसरी बात यह कि जूता फेंकने पर दाग नहीं पड़ता। स्याही फेंकने पर दाग कई दिनों तक रहता है। आपके हमले से हुए ज़ख्मों के निशान दुश्मन के शरीर पर लम्बे समय तक रहते हैं।

तीसरा यह कि स्याही फेंकने से शोहरत तो मिलती है पर कानूनी सज़ा मिलने के मौके कम हो जाते हैं। स्याही से शारीरिक चोट नहीं पहुँचती। इसलिए कोई वकील यह नहीं कह सकता कि आपका उद्देश्य चोट पहुँचाना था या जानलेवा था।

चौथा यह कि स्याही फेंकना ज़्यादा भारतीय है। इसमें होली वाला फलेवर आ जाता है।