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Friday, July 22, 2011

अगर आप धैर्य सीखना चाहते हैं तो लड़कियों के कपडे की दुकान जाइए!


बचपन से ही मैंने छिपकली को धैर्य के मामले में अपना गुरु माना है. यह न तो उड़ सकती है, न उछल सकती है और न ही काफी तेज़ भाग सकती है. पर कई मीटर दूर सुस्ता रहे कीड़े को शिकार बना डालती है. यह कीड़ा उड़ सकता है और पलक झपकते छिपकली की पहुँच से दूर जा सकता है. पर छिपकली बड़े आराम से, धीरे-धीरे, बिना कोई जल्दबाजी दिखाए, बिना आवाज़ किये उस तक पहुँचती है और एक झटके में उसे गटक डालती है.

पर कुछ समय पहले  मुझे भाग्य से एक नया गुरु मिल गया जिसके सामने छिपकली नर्सरी की विद्यार्थी से ज़्यादा कुछ भी नहीं. वो है लड़कियों के कपड़ों की दुकान में बैठा सेल्समैन. 

लड़कियों को ईश्वर ने एक अद्भुत प्रतिभा दी है. जौहरी की तरह कपड़ों को परखने की क्षमता. उनके सामने आप हज़ारों कपड़ों का अम्बार खड़ा  कर दें. वो घंटों परिश्रम करके, हर कपडे के एक-एक धागे का  एकाग्रचित्तता से अनुसंधान करके अपना पसंदीदा कपड़ा खोज ही निकालेंगी. भले ही वो कपड़ा एक नन्हा सा रुमाल क्यूँ न हो!

अगर सामने कपड़ों का अम्बार न हो तो वे अपना उत्साह नहीं खोतीं. वो पूरी तल्लीनता से कपड़ों का अम्बार खड़ा करने में जुट जाती हैं. 

ऐसी विशेष परिस्थिति में उस दुकान के सेल्समैन का धैर्य निखरकर सामने आता है. भले ही उस नारी को साड़ी खरीदनी हो पर वो प्रत्येक स्कर्ट, ब्लाउज, टॉप, टू पीस, टी शर्ट, बंजारा सूट, घाघरा इत्यादि का व्यक्तिगत रूप से निरीक्षण करेगी ही करेगी. सिर्फ अपने साइज़ का नहीं, बल्कि पृथ्वी के हर इंसान के साइज़ का.

वह सेल्समैन कभी अपनी मुस्कान नहीं खोता. महात्मा बुद्ध जैसी परम शान्ति अपने चेहरे पर चिपकाए वो एक के बाद एक कपड़ा दिखाते जाता है. उसकी आतंरिक शान्ति इस विचार से भी भंग नहीं होती कि उस नारी के प्रस्थान के पश्चात उसे उन सैकड़ों कपड़ों को बारी-बारी से तह लगाकर वापस शेल्फ में सजाना है. ताकि पंद्रह मिनट बाद फिर कोई अन्य जुझारू नारी आए तो उसे अम्बार खड़ा करने के अवसर से वंचित न रहना पड़े.

इस परम धैर्य के प्रदर्शन के बाद उसे मिलता ही क्या है? कई बार नारियां घंटों लगाने के बाद कुछ भी नहीं खरीदतीं. कुछ तो बिल बनवाने के बाद अपने फैसले से मुकर जाती हैं.

कभी-कभी सोचता हूँ अगर उस धैर्य का दस प्रतिशत भी मुझमें आ जाए तो मैं यह मानव जीवन सफल मानूंगा. पर यह धैर्य आए कैसे? मुझमें तो लड़कियों के साथ शॉपिंग जाने का भी साहस नहीं. 


आलोक रंजन

ब्लॉग: http://alok160.blogspot.com/
अन्य रचनाएँ: https://www.facebook.com/notes.php?id=607557539

4 comments:

Sonal Rastogi said...

:-)

प्रकाश गोविन्द said...

:))
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सत्य वचन

Alok said...

dhanyawaad!

Apoorv said...

aapne abhi isme unke shopping mall main window shopping karne ke plans ko bhi vistar se bakahan karna chahiye!!..gr8 job