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Monday, May 22, 2017

Eating


Belief versus Experience


5-Minute Breaks


Today


Practice


The Best Gift


The Present


Pain and Suffering


Notice Period


Living in the Present Moment


Thursday, May 11, 2017

Power of Present


एक ही खोज

कल शाम दिल्ली में मेट्रो से यात्रा करते समय एक बड़ी दिलचस्प चीज देखने को मिली। मेट्रो तकरीबन एक तिहाई खाली थी। मालवीय नगर में रुकते ही थोड़ा शोरगुल हुआ और कुछ लोग बड़ी तेज़ी से अंदर घुसे। सामान्यतः ऐसा राजीव चौक पर होता है। पर न तो यह राजीव चौक था, और न ही ऑफिस से वापस आने का वक़्त था जब भीड़ ज़्यादा होती है। ये लोग हरियाणा के शायद किसी गाँव से थे। इनमें कुछ छोटे बच्चे थे, बच्चों की माँ थी, बच्चों की दादी थी, और बच्चों के पापा और चाचा थे। ये सारे लोग मेट्रो में जिस उत्साह से घुसे, उससे लगा कि चंद्रमा पर जाने वाले अंतरिक्षयान में घुस रहे हों।
घुसने के बाद ये लपककर अपनी-अपनी पसंदीदा सीटें खोजने लगे। शायद खिड़की के पास की सीट खोज रहे थे। अब चूंकि मेट्रो में सारी सीटें खिड़की के पास होती हैं, इसलिए उन्हें ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। उसके बाद बच्चे और उनकी अम्मा-दादी बड़ी दिलचस्पी से खिड़की से बाहर का नज़ारा देखने लगे। बच्चों की दादी को सीट पर बैठना ज़्यादा पसंद नहीं आया इसलिए वो फर्श पे बैठ गईं (माना कि ऐसा करके वो नियम तोड़ रही थीं, पर नियम तो विजय माल्या भी तोड़ता है)।
कुछ देर वो शांत बैठे रहे। मैं भी अपनी किताब में खो गया। फिर अचानक वो खुशी से चिल्लाने लगे और मेरे बगल में आकर खिड़की से देखने लगे। मेरी समझ में नहीं आया कि अचानक क्या हुआ। एक बच्चे ने चिल्लाकर कहा, ‘कुतुब मीनार, कुतुब मीनार!’ सारे के सारे खुश हो गए। मैंने भी खिड़की से देखा। दूर पेड़ों के बीच कुतुब मीनार अपना सर उठाए खड़ा था। उनका उत्साह देखकर मैं हतप्रभ था।
कुतुब मीनार के गायब होते ही वो शांत हो गए। लगभग पाँच मिनट बाद फिर उनमें उत्साह की हलचल हुई। इस बार वो ‘हवाई जहाज’ चिल्ला रहे थे। मैंने खिड़की से देखा तो एक एरोप्लेन उड़ान भर रहा था। वो सारे बच्चे और उनकी अम्मा बड़े घ्यान से टकटकी लगाकर उसे देखे जा रहे थे। उनकी दादी फर्श पर बैठे कोई मंत्र जाप कर रही थी। पर वो भी कनखियों से उस एरोप्लेन को देखने की कोशिश कर रही थी। बच्चों के पापा भी अपना लालच कंट्रोल नहीं कर पा रहे थे। वो भी लोहे की चिड़िया को देखने लगे।
कुछ देर बाद मेरा स्टेशन आया और मैं उतर गया, पर उनलोगों का उत्साह और उनकी खिलखिलाहट मेरे जेहन में बस गए थे। इस मेट्रो से मैंने हजारों लोगों को यात्रा करते देखा है। लेकिन उनके चेहरे पर बोरियत के अलावा कभी कुछ नहीं दिखा। मैंने भी सैकड़ों बार यात्रा की है। मैंने भी बोरियत मिटाने के लिए या तो किताब पढ़ी है या फिर अपने स्टेशन के आने का इंतज़ार किया है। फिर हरियाणा के किसी गाँव के परिवार को इस मेट्रो में ऐसा क्या दिख गया कि वो इतने प्रफुल्लित थे?
थोड़ी देर बार मुझे जवाब मिल गया। बड़ा ही साधारण सा जवाब था। शायद वो पहली बार यात्रा कर रहे थे। उन्हें मेट्रो में नयापन दिखा। रोज यात्रा करने वालों को इसमें कोई नयापन नहीं दिखता। इसलिए वो बोर होते रहते हैं। फिर मेरी समझ में आया कि किसी भी चीज में कुछ खास नहीं होता। उसका नयापन ही उसे खास बना देता है।
ताजमहल के बगल में रहने वाले को उसमें सफ़ेद पत्थर की पुरानी इमारत के अलावा शायद और कुछ न दिखे, क्योंकि वो उसे वो रोज दिखता है, और उसे उसमें कुछ नयापन नहीं दिखता। हिमालय पर रहने वालों को हिमालय की खूबसूरती में कुछ नयापन नहीं दिखता होगा।लोग भले ही किसी मूवी स्टार के पीछे पागल हों, पर उस स्टार की बीवी या शौहर को शायद उसमें कुछ नयापन न दिखे। लेकिन किसी छोटे से गाँव के लोगों के मेट्रो या उड़ते जहाज को दूर से देखने में ही नयापन मिल जाता है।
नयेपन की खोज के कारण ही लोग नए रिश्ते, नई फिल्में, नयी जगहें और नयी जॉब खोजते हैं। कुछ लोग इस खोज में पूरी दुनिया का चक्कर लगा आते हैं। और कुछ लोग कम्प्युटर का वालपेपर बदलकर ही इस नयेपन का एहसास कर लेते हैं। अपनी-अपनी तबीयत है, पर खोज तो एक ही है।

Tuesday, May 09, 2017

The Pressure of Looking Good

Yesterday I was watching a long documentary on Hugh Hefner, the founder of Playboy. During the documentary, there were small interviews of women who had been beautiful models and Playmates many years back. In their youth, they looked ravishing. But now they looked very different. The extensive use of plastic surgery and Botox had destroyed the structure of their faces, bloated their lips and made their skin hang like bags. None of them looked like graceful old women. On the other hand, Hugh Hefner looked very graceful, like a mature grandfather who has aged in a natural way.

Generally many of us live in awe of good looking women who seem to carry the kind of power which comes to them effortlessly. The world gives plenty of attention to them. They get special treatment everywhere they go. They have more and better options while seeking a job or a man. There are professions which reward them handsomely for their looks. On every front, they have an advantage which seems a little unfair.  

But after watching those ex-Playmates in the documentary, I felt the dark side of being totally dependent on good looks for financial security and social status. Looks and youth are impermanent, and they come with an expiry date which cannot be extended with the help of chemicals and surgery. It’s natural to get frustrated when somebody starts losing good looks and the power that comes with it.

And today everywhere we glorify good looks. Many of us go to gym not for good health, but for a good body figure. With this obsession for physical beauty, we are increasing mental pressure on ourselves which will get worse with time. This mental pressure is a huge price to pay for the little attention we can get from others.

It’s better to seek happiness in other things which are more permanent. For middleclass types like us, taking a home loan could be a good option because its EMIs are everlasting. One can spend decades working in a bloodsucking organization because he has to get rid of the loan. It will guarantee happiness because leaving the job can bring instant unhappiness.


Tuesday, March 28, 2017

दुखी बनने की ट्रेनिंग

शाम में किसी पार्क में चले जाइए। छोटे-छोटे बच्चे खेलते हुये दिख जाते हैं। कितने खुश दिखते हैं वो! दरअसल सारे बच्चे खुश ही होते हैं। फिर उनको दुखी बनाने की ट्रेनिंग शुरू हो जाती है। और ये शुभ काम हम बड़े लोग उन्हें परिपक्व (mature) बनाने की आड़ में करते हैं। हमारा तरीका बड़ा ही आसान है, और ये पिछली सैकड़ों पुश्तों से अचूक परिणाम दे रहा है।

इस तरीके का पहला चरण है, उन बच्चों में तरह-तरह का डर बिठाना। पढ़ो नहीं तो फेल हो जाओगे। स्कूल में ध्यान दो नहीं तो बड़े होने पर बेरोजगार बन जाओगे। केवल इधर-उधर शैतानी करते हो। क्या होगा तुम्हारा?’ बारिश में खेलोगे तो बीमार पड़ जाओगे। इस तरह की बातें दिन-रात उनके कानों में ठूंस-ठूंस कर हम यह निश्चित कर लेते हैं कि डर के बीज उनके  दिमाग में अच्छी तरह बैठ जाएँ और ज़िंदगी भर इनसे तरह-तरह की चिंता और परेशानी की फसलें उगें और लहलहाती रहें। जब बच्चे चिंता करने लगें, उनके मन में बेपनाह डर बैठने लगे तो हमें लगता है उनका सही मानसिक विकास हो रहा है। अगर बच्चे को चिंता न हो तो हमारी खुद की चिंता चार गुणी बढ़ जाती है।

दूसरा चरण है, बच्चों को वर्तमान पल से निकालकर अतीत और भविष्य में धकेलना। किसी भी छोटे बच्चे को ध्यान से देखिये। वो जो भी काम करता है, उसमें पूरी तरह खोया रहता है। खेलता है तो बस खेलता है। चित्र बनाता है तो बस चित्र बनाता है। टीवी पर डोरेमोन देखता है तो सिर्फ डोरेमोन दिखता है। लेकिन हमसे उसका यह तरीका बर्दाश्त नहीं होता। हमें लगता है कि ज़िंदगी में इतनी परेशानियाँ हैं तो वो उन्हें अनदेखा करके वर्तमान पल में खुश कैसे रह सकता है। उसने एक साल पहले खाते समय टोमॅटो सॉस टेबल पर गिरा दिया था। उसे बार-बार उस गलती को याद करना चाहिए। उए यह भी सोचना चाहिए कि अगर वो धूल-मिट्टी में खेलेगा तो बीमार हो जाएगा, फिर क्लास में ठीक से नहीं पढ़ पाएगा, उसके बाद टेस्ट में फेल हो जाएगा, फिर वो बाकी बच्चों से पीछे छूट जाएगा, फिर वो ज़िंदगी भर एक असफल व्यक्ति बनकर रह जाएगा। हम बच्चे को सिखाते हैं कि किसी काम को पूरे मनोयोग  से करना और वर्तमान पल में रहना बेवकूफी है, और अतीत की किसी घटना को बार-बार याद करना एवं भविष्य की चिंता में खून जलाना एक जीनियस के लक्षण हैं।

फिर आता है तीसरा चरण – दूसरों से तुलना करना। बच्चे खेलते हैं खेलने के लिए। हम उन्हें सिखाते हैं कि खेलना चाहिए जीतने के लिए। हर बात में दूसरे से तुलना करो और उसे हराकर दिखाओ। अब चाहे वो वो मामला पढ़ाई का हो, संस्कारों का हो, अच्छे कपड़े पहनने का हो या फिर फेसबुक पर मिलने वाले likes का हो। ज़िंदगी एक जंग है जिसमें एक तरफ तुम अकेले हो, और दूसरी तरफ तुम्हारे दोस्त हैं, स्कूल के बच्चे हैं, रिश्तेदारों और पड़ोस के बच्चे हैं, अमेरीका और जॉर्डन में रहने वाले बच्चे भी है। तुम्हें दुनिया के हर बच्चे को हर चीज में हराना है। उनसे अपनी तुलना कर-करके अपनी खुशी को स्वाहा करना है। बड़े होने पर ये आदत नए-नए रूप लेती है। पहले टेस्ट में आने वाले मार्क्स की तुलना करते थे; फिर ऑफिस में बाकियों के सैलरी पैकेज से तुलना करते हैं। दुनिया भर में हजार तरह के बेमतलब के अवार्ड इसी बीमारी के लक्षण हैं। बीमारों की दुनिया में जो अपनी तुलना दूसरों से न करके शांत रहे, वो दुनिया की नज़र में असली बीमार है।

ये तो हुये तीन मुख्य चरण। उनके अलावा भी कई चीजों की बच्चों को ट्रेनिंग देते हैं ताकि उनके दुखी रहने में कोई कसर न रह जाये। उन्हें हरफनमौला (all-rounder) बनाने के चक्कर में उन्हें जबर्दस्ती सारे स्पोर्ट्स, चित्रकारी, संगीत, थिएटर और 84 हजार कलाओं की ट्यूशन कराते हैं। भाई, दुनिया में सिर्फ एक ही लियोनार्डो द विंची क्यों रहे! हमारा बच्चा भी तो विंची से कम थोड़े न है। तभी तो पड़ोसियों और रिश्तेदारों को दिखाएंगे कि हमारा बच्चा सिर्फ हमारा बच्चा नहीं, ओलिम्पिक में मिलने वाला गोल्ड मेडल है जिसे हम गले में लटका कर घूम सकें। इस तरह हमने बच्चों के प्रेशर में रहने की ट्रेनिंग देते जाते हैं। फिर हम उन्हें महान लोगों की जीवनगाथा पढ़ाते हैं, और बोलते हैं कि गांधी और लिंकन की तरह बनो। अब उस बच्चे ने गांधी और लिंकन को देखा तक नहीं। लेकिन उसे गांधी और लिंकन जैसा बनने का टार्गेट मिल गया है है।

आस-पास खोजो तो सारी क़िस्मों के लोग मिल जाएँगे ; बेपनाह अमीर मिल जाएँगे, फेमस लोग मिल जाएँगे, ऊंचे ओहदे वाले लोग मिल जाएँगे। लेकिन कोई ऐसा इंसान खोजने जाओ जिसे देखकर लगे कि वो पूरी तरह से खुश है और जिसे ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं है, तो निराशा ही हाथ लगेगी। इससे सिद्ध होता है कि हमारी यह ट्रेनिंग किसी कमांडो ट्रेनिंग से नहीं है, और इसकी सफलता की दर भी बेजोड़ है। भाई, पाँच हजार सालों से हमने इस ट्रेनिंग को निखारा है, और अब टेक्नालजी की सहायता से उसे और भी प्रभावकारी बनाते जा रहे हैं।







दिल्ली के एक ऑटो वाले से बातचीत के कुछ अंश

मैं : तो इस बार दिल्ली के एमसीडी इलैक्शन में ‘आप’ तो जीत जाएगी? 
वो : नहीं जी। एक वोट नहीं पड़ेगा उसको।
मैं : क्यों, ऐसा क्यों? 
वो : एक वायदा पूरा नहीं किया उसने। धोखेबाज है। दिन-रात मोदी की शिकायत करता रहता है। वो प्रधान मंत्री हैं। वो देश का काम करें। ये दिल्ली का सीएम है। इसे दिल्ली का काम करना चाहिए।
मैं : लेकिन पिछले चुनाव में तो आप लोगों ने पूरा सपोर्ट किया था।
वो : हाँ, हम ऑटो और टॅक्सी वालों ने इसे अपना वोट दिया था। हमें लगा था, नया आदमी है, कुछ करेगा। लेकिन ये तो बस दूसरों को गाली देता रहता है। बोला था आधी सैलरी में काम करेगा। उसकी तोंद देखकर तो नहीं लग रहा कि आधी सैलरी में काम कर रहा है। शीला दीक्षित अच्छी सीएम थी। ये फ़्लाइओवर और रोड उसने बनवाई थी। उसको चोर-चोर बोलकर हरवा दिया। अब खुद बन बैठा है। इधर-उधर घूमता रहता है।
मैं : लेकिन उसके मोहल्ला क्लीनिक की तो बड़ी तारीफ हो रही है।
वो : हमें तो नहीं दिखता कोई मोहल्ला क्लीनिक। उनपर ताले लगे रहते हैं। सिर्फ फोटो खिंचवाने समय खुलता है।
मैं : आपको कौन सी पार्टी सही लगती है?
वो : बीजेपी और काँग्रेस दोनों चलेगी। दोनों कुछ तो काम करते हैं। पर के बीजेपी के कुछ नेताओं के बोलने का तरीका मुझे अच्छा नहीं लगता। वो हिन्दू मुसलमान का झगड़ा कराते रहते हैं। मैं तो अयोध्या गया था। मेरी समझ में नहीं आया कि झगड़ा किस बात का है? मंदिर और मस्जिद के बीच का काफी फासला है। और फिर, अयोध्या में रहने वाले तो कभी नहीं झगड़ते। ये बाहर वाले ही झगड़ते हैं। मेरे गाँव में कोई इस बात पर झगड़ता है, तो हम बोल देते हैं, तुम्हें झगड़ना है तो अयोध्या जाकर लड़ो। हमारी मिट्टी खराब मत करो।
मैं : बीजेपी के साथ ये दिक्कत तो है?
वो : सर, पार्टी अच्छी है। इसमें काम करने वाले लोग भी हैं। बस ये हिन्दू-मुस्लिम का फसाद न करें। हमें क्या मतलब कि कब किसने किसकी मंदिर और मस्जिद तोड़ी। हमें काम करने का माहौल चाहिए; बच्चों की पढ़ाई-लिखाई चाहिए। ये झगड़ा तो पैसे वाले करते हैं, या फिर अनपढ़ करते हैं। फिर इन दंगों में हम जैसे लोग मारे जाते हैं। आजतक कभी किसी नेता को मरते नहीं सुना।
 मैं : यूपी में नए सीएम आए हैं। वो कैसे लगते हैं?
वो : काम तो कर रहे हैं। उनके भाषणों से थोड़ी इमेज खराब है।
मैं : काँग्रेस की सरकार ठीक थी। नहीं?
वो : मनमोहन सिंह अच्छे आदमी थे। पर उनको कोई पावर नहीं थी। इससे क्या फायदा? अच्छे आदमी को पोस्ट दोगे, लेकिन पावर नहीं दोगे तो पार्टी तो डूबेगी ही। ये MCD चुनाव में भी बीजेपी आएगी। वहाँ काबिल आदमी की कदर करते हैं। काँग्रेस में आगे बढ़नेनहीं देते। केजरीवाल उनको बाहर निकाल देता है।
मैंने सोचा कि उसका नाम पूछूँ। नाम से धर्म का पता चलेगा। फिर मैं चुप रह गया। ये मेरी नज़र में एक मेहनत करने वाला ऑटो वाला था जिसका राजनीति पर अपना एक दृष्टिकोण था। उसका धर्म जानकर इस दृष्टिकोण में मिलावट करने से कोई फायदा नहीं था।
(26 मार्च 2017)

Wednesday, March 22, 2017

पेंसिल का निर्वाण

पेंसिल से लिखने का जो लुत्फ है वो न आज तक मुझे किसी पेन से मिला न किसी कम्प्युटर के कीबोर्ड से। हालांकि पेंसिल से लिखना मेहनत का काम है। उसे बार-बार छीलना पड़ता है। उसकी बार-बार नोक बनानी पड़ती है। और जब वो छिलते-छिलते छोटी हो जाती है तो उसे पकड़ना आसान नहीं होता। लेकिन इसके बावजूद मुझे पेंसिल पसंद है। इसका कारण है पेंसिल का वो गुण जो मुझे बड़ा आध्यात्मिक (spiritual) लगता है, और वो मुझे बार-बार अपनी बार खींचता है।
पेंसिल से जितना लिखो, वो उतनी छोटी होती जाती है। कहाँ जाता है उसका वो हिस्सा जो गायब हो गया? लकड़ी वाला हिस्सा तो चलो किसी कूड़ेदान में गया। लेकिन वो कार्बन वाला हिस्सा? फिर मेरे ध्यान में आया कि वो तो कागज के टुकड़ों पर अभी भी ज़िंदा है। या तो किसी नोट्स के रूप में, किसी कविता के रूप में या फिर किसी स्केचके रूप में। पहले वो एक बेजान पतली सी छड़ (rod) के रूप में था; पर उसने अब कई रूप धारण कर लिए।
अगर वो कार्बन की छड़ मिटने से इंकार करती तो कभी भी कविता, कहानी या चित्र का रूप नहीं ले पाती। लकड़ी के कैदखाने में ही अपनी ज़िंदगी गुजार देती। इसलिए कुछ बनने के लिए कई बार मिटना पड़ता है। अपने पुराने स्वरूप को छोडना पड़ता है।
पाँच रुपये की पेंसिल में अनंत संभावनाएं (possibilities) हैं। लेकिन वो संभावनाएं तभी बाहर आएंगी जब पेंसिल मिटने को तैयार होगी। मिट जाने पर इस बात की गारंटी नहीं है कि वो उन संभावनाओं को साकार कर पाएगी। लेकिन अगर वो मिटने से इंकार करे तो इस बात की पूरी गारंटी है कि वो एक भी संभावना को पूरी नहीं कर पाएगी।


Saturday, March 18, 2017

Are atheists non-violent?

Nowadays it has become a common practice to equate religion with violence. Many people try to make us believe that religion is the sole reason behind violence, and irreligious or atheist people are the most non-violent ones. Oh really!
Let’s look at the some of the most violent historical events:
1. Joseph Stalin’s regime killed around 50 million people in Russia. Stalin was a Communist. Communists are atheists. 
2. Under Mao Tse Tung’s regime, around 45 million people in China were killed between 1958 and 1962. He was a Communist. Chinese Communists invaded Tibet, and killed around 1.2 million non-violent and religious Tibetans. Actually if you look at the mass murder records of atheists like Stalin and Mao, Hitler’s mass murder of 6 million Jews looks quite small. 
3. Winston Churchill let 3 million Indians die in the Bengal Famine of 1943. It had again nothing to do with religion. He called himself an atheist and agnostic. Looks like many of the biggest mass murders of the last century were very irreligious. 
4. World War 1 & 2 killed millions of people. They were fought because of colonialism and nationalism.
5. Pakistani government killed 3 million Bangladeshis in 1971. It had nothing to do with religion.
I am surrounded by hundreds of religious people. I never saw them indulge in any form of violence. Many of them are vegetarians, which means they don’t even support the killings of animals.
I feel the real reason behind violence is the human desire for power over others. That desire can use religion, nationalism, racism, communism, capitalism or any other ideology to manifest itself. If we blame religion for every act of violence, we are just telling a half-truth.

The Godfather: The story behind the story

Recently I read a book about the making of THE GODFATHER which changed my perception about the making of the masterpieces. I used to assume that a masterpiece is created with a lot of planning and a deep faith shown by the creators. Not in this case. This movie was a child of destiny and the result of unexpected events.
1. Mario Puzo didn’t want to write THE GODFATHER. He had no knowledge of mafia before writing the book. But at the age of 45, he was in a debt of thousands of dollars. So he decided to write something ‘commercial’ to save himself from poverty. When he wrote this book, he hated it so much that he threw it on the floor. But the book became an instant bestseller, selling 6 million copies within a year. It changed his fortune forever.

2. No director wanted to direct it, including Francis Ford Copolla. Twelve hot-shot directors had rejected it on different grounds, before Copolla agreed to direct it. He also didn’t want to touch this movie. When he read the novel, he found it very sleazy. But his friend suggested him that this movie will provide him money with which he could produce artistic movies.


3. Paramount Studio didn’t want to produce it because gangster movies had been flopping on the box office. But the success of the novel gave them some confidence, and they gave the green flag to direct it and also increased its budget to 6 million dollars. The movie went making 250 million dollars.


4. Except Marlon Brando all actors in the movie were unknown. The studio heads didn’t like Brando because he was considered to be ‘Box Office poison’. It was the persistence of Mario Puzo and Copolla that he got the role. When Puzo was writing the novel, he had Brando in his mind as Vito Corleone, and he had sent the screenplay to him for consideration.


5. Nobody wanted Al Pacino in the movie except Copolla. Actually Pacino was so sure that he won’t get the role that he didn’t bother to mug up his lines for the audition. But Copolla had deep faith in him, and he fought with the studio heads to keep him. It was only after the Solozzo scene in the restaurant that the studio heads were convinced that Pacino was the right person.


6. Above all, most of the people in the studio and the movie crew had absolutely no faith in the 29-years old Copolla as the director. Once he was sitting in the bathroom, and he heard two crew members saying that the director was a kid. There was a time when the studio guys had decided to fire him in the mid of the shoot. But he saved his ass by reshooting a scene and making them change the decision.
Before the shoot, THE GODFATHER was a movie you couldn’t trust to make. Decades after the movie was released, it’s still a movie you cannot ignore if you see it on any channel.

असाधारण होने की परेशानी

बचपन से हमें सिखाया जाता है कि हम बड़े असाधारण हैं, हम में ढेर सारी प्रतिभा है, हम दूसरों से बेहतर हैं। इस सिखावन के पीछे उद्देश्य रहता है कि हम जीवन में आगे बढ़ें और कुछ करके दिखाएँ। लेकिन कई बार परिणाम ठीक उल्टा आता है। चूंकि हमारे मन में बैठ जाता है कि हम दूसरों से बेहतर हैं, इसलिए हम जीवन भर इस कोशिश में लगे रहते हैं कि अपने आपको कैसे बेहतर सिद्ध कर सकें। हम जान-पहचान के लोगों और अजनबियों से हर वक़्त रेस में लगे रहते हैं। कभी शांति से रह नहीं पाते।
अगर हम यह मान लें कि हम भी वैसे ही हैं जैसे दूसरे हैं, न बेहतर और न खराब, तो ये बेमतलब की मानसिक रेस खत्म हो जाती है। फिर जीवन में शांति आ जाती है। अपनी खुशी के लिए अपने-आपको दूसरों से ज़्यादा सफल और बुद्धिमान दिखाने की फिराक में नहीं रहते। और आराम से सोफ़ा पर बैठकर सुड़क-सुड़क कर कॉफी पी सकते हैं।

SOKA GAKKAI: IS IT TRUE BUDDHISM?

If you follow a chanting group called Soka Gakkai International (SGI), maybe you should do a little investigation before believing that you are following Buddha’s teachings or a genuine spiritual group. I have attended a few classes of this organization, and I was surprised at what they were teaching in the name of Buddhism.
According to SGI, you can chant for more money, a bigger car, a 5 BHK flat or any of your materialistic desires, and somehow you will get them. Actually, according to them, you can achieve anything just by chanting "Nam'-myo-ho-ren-ge-kyo". There is no harm is having a desire for these things and working hard for them or in finding a so-called shortcut to achieve them. But why would you call it a spiritual path or, specifically, Buddhism?
Gautam (or Sakyamuni) Buddha left all his money and possessions to pursue the truth. He also motivated his followers to live a simple and ascetic life and focus completely on their spiritual path. But in SGI classes, you will find most people talking about how they used SGI’s so-called Buddhism and chanting for materialistic success. Quite an irony, isn’t it? According to SGI, the earthly desires are enlightenment. Well, if that’s the truth, Gautam Buddha should have stayed in his kingdom, expanded his empire and conquered other kingdoms like any other ambitious and greedy king to get enlightened. But he didn’t do so, right!
Buddha’s teachings revolved around developing your awareness for which he taught a meditation technique called Vipassana (also known as Anapana). He never taught anything called SG’s Lotus Sutra or chanting which would help you in increasing your wealth. Actually the story behind Lotus Sutra is completely different. In Indian spiritual paths, Lotus or Padma is a symbol of enlightenment. One of the important disciples of Buddha, Mahakashyap understood Buddha’s teachings through silence and got enlightened. Buddha gifted him a small lotus on this occasion without saying anything. From here, Zen Buddhism started which teaches without using much words and letting the students find their own truth.
SGI is doing to Buddha what many Indians are doing to Sai Baba. Sai Baba lived a monk’s life, but most of his devotees have turned him into an ATM machine from which they expect miracles to become wealthier. If you meet Sai Baba’s devotees, you will find them sharing ‘miraculous’ stories about how their desires got fulfilled. The same thing happens with many SG students who tell similar stories in their weekly classes.
Apart from misleading about Buddha’s teachings, SG’s own track record in Japan is full of crimes and illegal activities. To be frank, this organization is much like our own Asaram who enjoys a big following, a huge clout in political circles and owns fathomless property.
SGI’s owner Ikeda is a business tycoon who enjoys absolute power in the organization. He is also the power behind a Japanese political party called New Komeito. Why would a spiritual organization want to have a political party? You are seeking the truth or the throne?
Many of SGI’s former members have launched a website to inform about the antisocial activities, crimes and infringements of human rights committed by this organization. You can read about them in detail here: http://www.toride.org/edata/bbc.html
Soka Gakkai is yet to become strong in India, and it hasn’t started applying its arm-twisting methods to subjugate its followers. But it has been doing so for a long time in Japan about which you can read here: https://sokagakkailies.wordpress.com/…/is-sgi-a-cult-does-…/
Another informative article on how SGI manipulates people to propagate its business and political power in the name of Buddhism: http://markrogow.blogspot.in/…/the-definitive-analysis-on-w…
A Forbes article on the limitless money SGI owns and how it uses tax regulations to expand its empire: http://www.forbes.com/forbes/2004/0906/126.html
SGI is not the first example of how “spiritual” masters use people’s frustration with the sufferings of life and their desire for money, fame and power to increase their own political and financial power. Our country is full of such gurus and teachers who own property worth thousands of crores of rupees which they have earned from objectionable sources. And such masters do have a huge following because many people would like to believe in a shortcut (in this case, the chanting) which promises them to fulfil all their desires.
Well, if you just want a shortcut to be rich and famous and solve every problem of life, please follow SGI. After following them for months and years, any positive incident in your life will appear like a magical effect of chanting. But please do a research on Buddhism before you start believing that you are following the spiritual path taught by Buddha.
There is a huge difference between being a ruthless seeker of truth and being an advocate of an organization. The Buddha said that if you meet the Buddha on the road, kill him. It means you shouldn’t be too faithful or attached even to the Buddha. Well, you can start by killing your faith in SGI and doing your own research to find the truth.
NOTE: If you want to learn how spiritual cults slowly brainwash people, SGI can be a great teaching ground.

आराम वाला फेज

बचपन से ही सुनते आ रहे हैं। ‘बेटा, बोर्ड अच्छे नंबर से पास कर लो, फिर आराम करना।‘ ‘बेटा, बस अच्छे कॉलेज में एड्मिशन हो जाये, फिर लाइफ की टेंशन खत्म।‘ ‘यार, बस एक बार campus selection हो जाये, फिर तो तेरी चांदी है। आराम करते रहना।‘
सब कुछ हो गया। बोर्ड पास कर गए, कॉलेज भी खत्म हो गए, जॉब करते हुये सालों बीत गए, लेकिन अभी तक वो ‘आराम करने’ वाला फेज नहीं आया। जिन्होने EMI पर मकान खरीद रखा है, उनकी ज़िंदगी में अगले बीस सालों तक तो आयेगा भी नहीं।
तो फिर बचपन से ये क्यों बताया जाता है कि वो वाला काम कर लो, उसके बाद आराम ही आराम है। हमारे बाप-दादाओं ने हमें ये झूठ बताया; और अपने बेटे-पोतों को भी हम ये ही झूठ बताएँगे। हम ये क्यों नहीं मान लेते कि ज़िंदगी में समस्याएँ मुंबई की लोकल ट्रेन की तरह हैं। हर 2-3 मिनट पर आती ही रहेंगी। तुम लाख दिमाग लगा लो, एडी-चोटी का पसीना एक कर लो, समस्याएँ कभी खत्म नहीं होने वाली।
बस एक चीज खत्म हो सकती हैं; वो है समस्याओं के खत्म होने की आशा। और जब ये आशा खत्म हो जाती है तो मन में एक अनोखी शांति भरने लगती है। भविष्य के किसी आरामदायक पल की तलाश छूटने पर इसी पल में अपने-आप एक सुखद आराम भर जाता है। जिसे सालों से खोज रहे हैं, वो अपने-आप प्रकट हो जाता है।
फिर लोग हमसे पूछते हैं, “तुम इतने relaxed कैसे रह लेते हो? लगता है, तुम्हारी लाइफ में प्रोब्लेम नहीं है।“

राजाओं का परिवार प्रेम

हम लोग कई बार राजा महाराजाओं की ज़िंदगी से काफी प्रभावित हो जाते हैं। उनके बारे में सोचते हैं तो लगता है क्या लाइफ थी इनकी? इतनी ताक़त, इतना धन, इतना ऐश्वर्य! भाई, ज़िंदगी तो वो जीते हैं। हम मिडिल क्लास टाइप लोग क्या जानें कि शाही ज़िंदगी के ठाट-बाट क्या होते हैं। लेकिन अगर ध्यान से उनकी ज़िंदगी को देखें तो शायद हमारा नजरिया बदल सकता है। चलिये, प्राचीन इतिहास से नज़र डालते हैं।
महाभारत काल से शुरू करते हैं। इस समय के तीन प्रमुख किरदारों को लेते हैं: पांडव, कौरव और कृष्ण। पांडवों के पिता को एक अजीब बीमारी थी इसके कारण वो उनके बचपन में चल बसे। उसके बाद से बचपन से ही उनके चचेरे भाइयों ने उनको मारने की कोशिशें शुरू कर दी। भीम जब छोटे थे तो उनके खाने में जहर मिलाकर उनको नदी में बहा दिया गया, पर वो बच गए। उसके बाद लाक्षागृह में उनको जलाकर मारने की कोशिश की गई। जब बड़े हुये तब संपत्ति के नाम पर खांडववन नाम का जंगल-झाड दिया गया। उन्होने बड़े परिश्रम से वहाँ एक सुंदर शहर बसाया। लेकिन जुए में वो सब हार गए। उनकी पत्नी को सबके सामने बेइज़्ज़त करने की कोशिश की गई। तेरह साल जंगल में भटकने के बाद जब वापस आए तो उनको उनकी संपत्ति वापस नहीं दी गई। संपत्ति वापस लेने के लिए युद्ध किया तो उसमें उनके सारे बेटे अश्वत्थामा के हाथों रात में मारे गए।
कौरवों की ज़िंदगी तो बड़ी शानो-शौकत वाली थी, पर युद्ध में उन सबकी मौत हो गई। उनके परिवार का एक वारिस न रहा सिवा युयुत्सु के। उनके माँ-बाप को भगवान ने सौ बेटे दिये थे, पर सब के सब भारी जवानी में ही चल बसे।
कृष्ण के माता-पिता को उनके ही मामा ने जेल में डाल दिया था। कृष्ण के पहले उनके सात भाई पैदा हुये थे जिन्हें मामा ने पैदा होते हुये ही मार डाला। उनको दूर एक गाँव में पाला गया लेकिन उनकी हत्या की कोशिशें होती रहीं। अगर उनमें दैविक शक्ति नहीं होती तो वो आत्म-रक्षा भी नहीं कर पाते। जब वो बड़े हुये तो उनकी ज़िंदगी अच्छी रही। लेकिन उनकी मृत्यु जंगल में एक शिकारी के तीर से हुई। उनकी मृत्यु से पहले उनके सारे यादव भाई सत्ता के मद में पागल हो गए थे, और आपस में ही लड़ने लगे थे। इससे कृष्ण काफी दुखी थे।
अब आते हैं महान राजा अशोक के परिवार पर। उसे चांडाशोक कहते थे क्योंकि राजगद्दी पाने के लिए उसने अपने सौ भाइयों-संबंधियों का खून कर दिया था। कलिंग युद्ध के बाद उसका हृदय-परिवर्तन हुआ और उसने खून-खराबा तो बंद कर दिया। लेकिन उसकी एक रानी तिष्यरक्षिता उसके लायक बेटे कुणाल से जलती थी, इसलिए उसने षड्यंत्र करके उसकी आँखें फुड़वा दी थीं। इतना शक्तिशाली राजा बिना किसी योग्य उत्तराधिकारी के मरा।
मुगलों की ज़िंदगी में भी आपसी खून-खराबा बेमिसाल था। शाहजहाँ और औरंगजेब का किस्सा लेते हैं। शाहजहाँ के चार बेटे और दो बेटियाँ थीं। औरंगजेब जब दिल्ली फतह करके आया तो उसकी बहन रोशन आरा ने उसका साथ दिया था। औरंगजेब ने पहला काम ये किया कि उसने अपने बाप को जेल में डलवा दिया। डेढ़ साल बाद उसका बड़ा भाई दारा शिकोह पकड़ा गया। दारा को चाँदनी चौक में हाथी के पैरों से बांध कर गली-गली में घुमाया गया। जेल में किसी ने दारा का कत्ल कर दिया। जब दारा का सिर औरंगजेब के पास लाया गया तो उसकी बहन रोशन के दिमाग में एक आइडिया आया। अगले दिन सुबह जब शाहजहाँ उठा तो उसने देखा कि उसके बेटे औरंगजेब ने उसके लिए एक तोहफा भेजा है। उसने तोहफा खोला तो देखा कि उसमें उसके प्यारे बेटे दारा का सिर है। ऐसा कितने परिवारों में होता है कि एक बहन अपने भाई को सलाह देती है कि वो अपने दूसरे भाई का सिर अपने पापा को ब्रेकफ़ास्ट के समय गिफ्ट के रूप में भेजे। इस घटना के कई साल बाद औरंगजेब ने अपनी प्यारी बहन रोशन को भी जहर खिलाया जिससे वो डेढ़ महीने तक तड़प-तड़प कर मरी। फिर उसकी लाश को उसी के बनाए पार्क में दफना दिया। आज भी वो पार्क दिल्ली में है। फॅमिली-लव की ऐसी स्टोरी तो एकता कपूर के टीवी सोप में भी नहीं मिलती।
आजादी के बाद नेहरू परिवार ही हमारा शाही परिवार रहा है। इस परिवार के बारे में ज़्यादा बोलने की ज़रूरत नहीं है। इंदिरा की हत्या हुई, संजय हादसे में मारे गए (वैसे कहते हैं ये एक हत्या थी), और फिर राजीव की भी हत्या हुई। उनके पास वाडरा जैसा दामाद है और राहुल गांधी जैसा ओजस्वी उत्तराधिकारी बेटा है।
हम में से कितनों के परिवार हैं जहां ऐसी वीर रस की घटनाएँ घटती हैं? उल्टे हम होली दीवाली पर मिलते हैं, खुशियाँ मनाते हैं। हमें इस बात का डर नहीं सताता कि हमारा अपना भाई हमें बैकुंठ लोक पहुंचाने की व्यवस्था कर रहा है। इसलिए बेहतर है कि राजा-महाराजाओं की कहानियाँ पढ़ें, लेकिन उनके जैसी ज़िंदगी की तमन्ना करने से पहले थोड़ा सोच लें।

ADULTERY IN CHURCH

When God closes a door, He opens a new one. But when I went to attend Mumbai’s famous Kala Ghoda festival yesterday, God hadn’t closed any door. He had simply made it so crowded with never-ending queues that I didn’t dare to enter. But I was okay with it since I had already visited it once a day back, and it was my second turn. So I decided to enter the new doors which led to Jahangir Art Gallery and National Gallery of Modern Art.
After spending an hour watching the paintings in these two galleries, I decided to take an aimless walk into the nearby area in Kolaba. This place is full of buildings from the Portuguese and British era, and I couldn’t stop admiring their ageless beauty. Compared to those structures, our modern architecture looks too boring and unartistic with its banal and box-like shapes. In the quest for utility, it seemed, we had forgotten the essence of beauty.
Unlike the suburban part of Mumbai where I live, Colaba is spacious, organized, full of greenery and peaceful. Taking a stroll in this area filled me with tranquility, and I remembered how the author had described its history in his book MUMBAI FABLES (the sourcebook of the movie, BOMBAY VELVET).
And then I saw a church. I have studied in a wonderful Christian school in my childhood, and since then I have always had affection for churches because of their peaceful and clean environment. So I thought maybe I should use this opportunity to spend some time here.
Not that I visited dozens of churches in my life, but Cathedral of the Holy Name, Colaba, is the biggest and most beautiful church I have ever been to. Its hall must be as big as a football field, and its walls are full of pictures from the different stages of Christ’s life. Then you have murals of the great saints from Christianity. The ceilings do have the huge paintings of Jesus, and I wondered how they must have been created. Did some great artist paint them in the same way Michelangelo had painted the Sistine Chapel in Vatican City? Or they were painted on canvases and later on fixed upon the ceiling? I have no idea, but they looked wonderful anyway.
I sat there with hundreds of people who had come to attend the prayer and the sermon by the priest. When the music and the prayer started, I got transported into the last scene of GODFATHER where Michel Corleone’s sister’s son is getting baptized by the priest in a majestic church while his gunmen are busy shooting the heads of five families of New York. Surprisingly, I was sitting in a church, but my mind was playing the most violent scene of one of the most violent movies made in the world cinema. That’s the distracting power of movies.
Within minutes, GODFATHER vanished from my mind, and I started enjoying the prayer. It was a joyful experience being surrounded by the beautiful artwork, peaceful ambience, soulful music and spiritual vibes. After the prayer, the head priest got up and started giving a sermon on God’s laws and why we should follow them. He started with the importance of traffic rules, and very soon switched to the difference between sexual desire and lust.
According to him, it’s okay to have a sexual desire for your wife, but it’s not okay to have lust for a woman you are not married to. Well, that’s the difference between sexual desire and lust. If you want to have a good time with your wife, that’s sexual desire. And if you have similar ambitions for some other woman, it’s lust. Simple and clear! But his speech seemed very male-centric. He didn’t explain if it applied to women as well.
Then he went on defining the act of adultery. He said if you have a desire for a woman outside your marriage, you have already committed adultery. You have one unguarded thought, and you are already a sinner. I wondered if somebody really had so much control over his thoughts. And if somebody has acquired such a superhuman control over his thoughts, he won’t need to listen to such sermons.
Suddenly I noticed I was sitting next to a young and good looking woman. So far, I was oblivious to her existence, soaking in the joyful aroma of the place, but the priest’s speech on adultery made me conscious about her. I realized I shouldn’t be having any desire for her while sitting in a church and listening to God’s words. The more I tried to control my thoughts, the more my mind focused on her. If the priest hadn’t discussed about sin, I won’t have felt attracted towards committing a sin. Unknowingly and unintentionally, the priest had pushed me towards the path he wanted to stop me from taking. It gave me an insight into why the religious types are more prone towards becoming sinners.
After his speech, more songs and prayers followed, and the music distracted my mind from the possibility of adultery. I started enjoying myself again. I decided that I will surely visit this church whenever I come to this area in future. This experience was simply too beautiful to miss.
Then after some instruction from the priest, many people got up and started moving towards two nuns. I also stood up and joined a queue. The nuns were offering them white sweets which looked like Indian ‘batasha’. I thought this was the Christian version of our Hindu ‘prasad’ offered after worship. When my turn came, the nun asked me something I couldn’t understand.
So I said, “Sorry, ma’am!” The expression on the nun’s face became slightly unpleasant, and she asked in an authoritative voice, “Are you a Catholic?” I said, “No”. Then the nun spoke, maintaining the voice tone, “This is only for Catholics.” I gave a polite smile and moved away from her.
My plans of staying there and visiting this church again got destroyed in a second. I quietly came out of the church. From the street, I gave a last look at the church and thanked Jesus. After all, she had only asked me if I were a Catholic. It might have been more unpleasant if she had asked me if I were a Christian.

Kagaz Ki Kashti aur Sheila Ki Jawani

We always glorify childhood as a phase in life where we had no worries and we had plenty of freedom. My childhood was good, but I am not able to identify with this poetic glorification.
Let’s start with worries. I had too many worries in my childhood. I had to do lots of homework; I had to bring good marks in exams; and I had the pressure of getting up early because my school started at 7 o’clock in the morning. The performance pressure in school was not less than the pressure in workplace. And there was pressure of looking like a good boy in the neighborhood which was not less horrible.
And now let’s talk about freedom. I had to ask for money even for a small chocolate. I wasn’t supposed to stay outside home after late evening. I had to wear school uniform. I could watch television only for half an hour in a day. I had to be respectful to many relatives and neighbors even though they did everything not to deserve it.
We glorify childhood because we glorify the past. And we glorify the past because our mind tries to retain pleasant memories and discard the unpleasant ones. Compared to my childhood, I feel I have more or less the same amount of worries and freedom although their form has changed. Today I may not have ‘kaagaz ki kashti and barish ka pani’, but I am quite happy with ‘kaagaz ki kitaabein and Sheila ki jawani’.

हमारी priorities

अगर इस देश से दस सालों के लिए किसान गायब हो जाएँ तो अधिक से अधिक क्या होगा? हम रोटी चावल नहीं खा पाएंगे। शायद भूखे मर भी जाएँ। वैसे भी शरीर मरता है; आत्मा थोड़े न मरती है।
लेकिन अगर इस देश से दस साल के लिए क्रिकेटर और फिल्म वाले गायब हो जाएँ तो कितना घोर अनर्थ हो जाएगा। हमारा पूरी तरह से मनोरंजन नहीं हो पाएगा। ज़िंदगी में कितनी बोरियत हो जाएगी। टीवी पर आने वाले इश्तेहारों में हमें कौन बोलेगा कि कोका कोला पियो! हम यह नहीं जान पाएंगे कि किसका किससे अफेयर चल रहा है और ब्रेक-अप होने के बाद यूरोप में दिल हल्का करने कौन गया है। हमें पता नहीं चल पाएगा कि किस स्टार का बेटा खुद स्टार बनाने के लायक हो गया है। हम यह भी नहीं जान पाएंगे कि किसका वन-डे में कितना स्कोर है, और कौन किसका रेकॉर्ड तोड़ने वाला है।
इसीलिए साल भर में हज़ार किसान ख़ुदकुशी कर लें तो हम उसकी तरफ ध्यान भी नहीं देना चाहते। लेकिन फिल्म या क्रिकेट से जुड़ा आदमी एक ट्वीट कर दे तो हड़कंप मच जाता है। हम पढे-लिखे, technology-friendly और समझदार लोग अच्छी तरह जानते हैं कौन सी चीज को कितनी अहमियत देनी है। हमारी बात ही निराली है।

BUTTERFLY EFFECT IN THE CREATION OF PAKISTAN


Is it possible that some fishes, a casual remark and a grey film could have led to the partition of India? Let’s find out.
Sometimes a very small and insignificant event can lead to a huge effect later on. It’s called Butterfly Effect. It can also lead to the creation of a new country, the displacement of twelve million people, the loss of around two million lives and permanent animosity among people who used to share their bread and ancestry at one point of time. If we study the life of Muhammed Ali Jinnah, the founder of Pakistan, we will find three incidents which led to the butterfly effect, resulting into one of the most significant and bloodiest midnights in the world history.
To know these three small events, we will have to start with Jinnah’s grandfather, Premjibhai Meghji Thakkar, who was a prosperous Hindu merchant from Kathiawar, Gujarat. He had made his fortune in the fish business, but he was ostracized from his vegetarian Lohana caste because of their strong religious beliefs. When he discontinued his fish business and tried to come back to his caste, he was not allowed to do so because of the huge egos of the self-proclaimed protectors of Hindu religion. Resultantly, his son, Punjalal Thakkar (the father of Jinnah), was so angry with the humiliation that he changed his and his four sons’ religion, and converted to Islam.
This was not the first incident when a Hindu had tried to come back to his religion and he was not allowed to do so by the priest class. When Islamic invasion began in India in 12th century, many Hindus had lost their religion because of petty rules like drinking the water poured by a Muslim in their ponds, being forcibly converted to Islam or going to places outside India. When they tried to reconvert to Hinduism, the stubborn priests blocked their path and branded them as permanent dharmabhrashta. This led to animosity in them for Hindus, and they converted to Islam and taught a lesson to those priests by killing them mercilessly. Today, a lot of Indian Muslims don’t want to accept their Hindu ancestry, and the humiliation their ancestors felt centuries ago could be the reason behind it.
That’s the first butterfly effect. If Jinnah’s grandfather were allowed to come back to his caste and religion, Jinnah would have remained a Hindu, and he won’t have used his genius in creating a new country for Muslims.
In 1929, Jinnah’s wife, Rattanbai Petit, died due to a digestive disorder. He was so devastated at her death that he moved to London. He led a very private life, lived in a large house, played billiards and attended theatre. But things took a drastic turn when he heard a comment made by his arch-rival, Jawahar Lal Nehru. In a private dinner party, Nehru had remarked that Jinnah was ‘finished’. It made Jinnah so furious that he packed up and headed back to India with the intent to ‘show Nehru’. He fired up the Muslim League, and transformed it from a scattered band of eccentrics to the second most powerful political party of India.
That’s the second butterfly effect. If Nehu hadn’t made that remark, Jinnah would have stayed in London, Muslim League won’t have become so powerful and India might have stayed united.
Just one year before the partition and independence of India, Jinnah’s doctor, Dr. J. A. L. Patel, discovered something in the X-ray report of Jinnah which could have destroyed the gigantic efforts to create Pakistan. Dr. Patel discovered two dark circles in the report which could have upset the Indian political equation and would have almost changed the course of history. Jinnah was suffering from Tuberculosis which left him only two or three years to live at most. He pushed Mountbatten for a speedy freedom and partition of India to make sure he made the mark in history before he died. The secret of Jinnah’s disease and imminent death stayed between him and his doctor, ensuring the bloody historical event.
That’s the third butterfly effect. That grey film had the secret to block the partition, and it was stopped from coming out by a Hindu doctor who thought his professional ethics was more important than the lives of millions. Had this report become public knowledge, Gandhi and Mountbatten might have delayed the independence of India to let the gentleman die and avoid the partition.
In the movie, Gladiator, the main character, Maximus says, “What we do in life echoes in eternity.” We have no idea what eternal effect can come from something insignificant we are doing today. Jinnah’s grandfather would have never thought that his decision to go into fish business would have impacted the lives of millions one century later.
SOURCE: Freedom at Midnight (Dominique Lapierre and Larry Collins); Indian Summer (Alex Von Tunzelmann; Sanskruti Ke Char Adhyay (Ramdhari Singh Dinkar)

भैंस का वालपेपर

मध्य प्रदेश में छिंदवाडा से जबलपुर के बीच की सड़क भैंस की चमड़ी जैसी है। बिलकुल काली और पूरी तरह चिकनी। इसलिए जब सुबह-सुबह किराए की स्कार्पियो को उसका मालिक और ड्राईवर सौ की स्पीड पर भगाए ले जा रहा था तो लग रहा था कि गाडी हवा में तैर रही है।
सामने उगता सूरज था और अगल-बगल में हरे-भरे खेत। तभी बगल में सड़क पर एक कुत्ते की लाश दिखी। किसी गाडी ने उसे कुचल दिया था। रक्त और मांस का लोंदा दिख रहा था जिस पर कुत्ते की चमड़ी कहीं कहीं दिख रही थी।
थोड़ी दूर आगे जाने पर एक सफ़ेद इंडिका सड़क से दो सौ मीटर दूर गड्ढे में गिरी दिखी। सिर्फ उसका पिछला हिस्सा सलामत था। तकरीबन आधे घंटे आगे एक बिल्ली की लाश सड़क पर दिखी। चमड़े के बचे हिस्से को देखकर लगा बिल्ली ही होगी।
अब मुझे प्रक्रति का सौंदर्य दिखना बंद हो गया था। मेरा मन उन मृत पशुओं की आख़िरी चीख की कल्पना करने लगा था। पर अभी ये सिलसिला बंद नहीं हुआ था। सड़क पर एक ट्रक खडा था जिसका अगला हिस्सा मचोड़े हुए अखबार की तरह दिख रहा था। सामने एक एम्बुलेंस और कुछ पुलिस वाले खड़े थे। इस हाईवे पर बिल्ली और ट्रक दोनों ही बराबर असुरक्षित थे। साइज़ से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
पहली बार ज़िन्दगी में सौंदर्य और मौत को एकसाथ देख रहा था। मन बड़ा बेचैन हो रहा था। तभी अचानक गाडी धीमी हुई। सामने कुछ बसें रुकी हुई थीं। लगा कि अबकी बार काफी बड़ा एक्सीडेंट देखने को मिलेगा। धड़कनें बढ़ गयीं।
धीरे-धीरे करके बसें बढ़ने लगीं और हमारी स्कार्पियो भी गतिमान हुई। और तभी इस जाम का कारण दिखा। सड़क के बीचों-बीच एक भैंस बड़े इत्मीनान से कुछ चबा रही थी। उसके चेहरे पर जो शान्ति थी वो आस्था चैनल पर उपदेश बरसाने वाले अरबपति बाबाओं के चेहरे पर भी नहीं दिखती है।
मैंने भैंस को ध्यान से देखा। उसने भी एक नज़र मुझे देखा फिर मुझे इग्नोर कर दिया। उसके चेहरे की अनासक्ति (detachment) में चुम्बकीय आकर्षण (magnetic attraction) था। वो भैंस इतनी chilled out थी कि उसे देखकर हॉलीवुड की फिल्मों में कूल बनने की एक्टिंग करने वाले भी शर्मा जाएँ।
आस-पास एयरकंडीशंड गाड़ियों वाले किसी तरह से बचते-बचाते अपनी गाड़ियां निकाल रहे थे। उनके चेहरों पर परेशानी थी पर धूप में खड़ी भैंस के चेहरे पर परम शीतलता थी। उसे न कहीं जाने की जल्दी थी और न कहीं पहुँचने की तड़प। उसे न कुछ पाना था, न कुछ बचाना था। वो पूरी तरह वर्तमान पल (present moment) में थी।
मेरे लैपटॉप पर नॅशनल जियोग्राफिक वालों का बनाया हुआ टाइगर का वॉलपेपर है। सोचता हूँ उसे हटाकर भैंस का वॉलपेपर लगा लूं।
जिसने आजकल की भागमभाग वाली ज़िन्दगी के हाईवे पर भैंस की तरह शांत रहना सीख लिया उसने सब-कुछ पा लिया।

Why we tolerate harrassment

As more and more women are coming up with incidents of molestation by the TVF guy, Arunabh Kumar, it is quite possible that he is not innocent. But it's surprising that these women took so much time to come out and share the incidents. And they are not from small tribal villages with no education and no voice. Most of them are well-educated, financially self-dependent and empowered enough to voice their opinion in English on social media.
Then why didn't they come up earlier? Different people may have different reasons, but there could be one common reason in many of them, I feel.
And this reason has nothing to do with their gender. Even a male would have avoided to put allegations on a hotshot. This reason has something to do with the way our industry works in many cases. On a subtle and invisible level, our industry works like mafia. In mafia, there is a code of silence which is called omerta. This code asks you to keep quiet if a powerful guy is targetting you. If you don't keep quiet, your life will get more difficult which most of us don't desire. It may also lead to your annihilation.
If you take panga with your senior or your workplace, your life will be hell and your chances of getting another job will decrease drastically overnight. Others won't be exited about hiring you because you will be branded as a rebel and people like 'baghawat' in movies, not in their teams.
That's why people tolerate harassment whether it's sexual in nature or not. They put their self-esteem in a dusbin to protect their employability because in a big city it's easier to live without self-esteem than without money. And they come out in public to raise their voice only if they have lost the fear of losing things even more or they are sure that their tormenter cannot harm them any more.

A Revolution at Zero Decibel

In Bihar Vidhan Sabha Elections, 2015, BJP lost to Nitish Kumar because of one important reason: women. In UP Vidhan Sabha Elections, 2017, BJP won by a landslide because of the same reason: women.

Before Bihar elections, Nitish Kumar had promised to women that he would ban alcohol in the state. Women are the biggest victims in our society, especially in the lower class, if their husbands happen to be alcoholics. Their shauqeen husbands waste the hard-earned money at daru ka theka, and make the lives of their wives and other family members miserable. That’s why, on the voting day, women voted for Nitish Kumar on a massive scale even though their male family members were devoted to BJP.

Before UP elections, BJP had promised to ban Triple Talaaq, which seems to have made an impact on Muslim women. These women cannot hope the same from the so-called secular parties whose main strategy is to keep hardliner Muslim community leaders happy so that there is no dent in their Muslim vote bank. It’s being said that lots of Muslim women voted for BJP although their male family members voted against BJP.  We hope BJP works towards banning Triple Talaaq with the same ferocity Nitish Kumar has worked towards banning alcohol.


For me, that’s real woman empowerment. In these two cases, women didn’t try to imitate men and their bad habits to look powerful. They didn’t try to bash up men to prove their own worth. They didn’t make idiotic videos to promote celebrities’ idea of feminism. They silently took their own decision, without seeking any approval from their pati parameshwars and maulana sahibs. This revolution happened silently, and when a revolution takes place silently, it gets more deadly.