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Wednesday, May 04, 2011

'दम मारो दम' गीत का भावार्थ


प्रस्तुत फिल्मी गीत कला और साहित्य के क्षेत्र में निरंतर हो रहे नक़ल और बलात्कार के अद्भुत समन्वय को प्रदर्शित करता है. शीला और मुन्नी जैसे सुपरहिट आयटम गीतों की सफलता की  चाह रखने वाले  गीतकारों और संगीतकारों ने अपने आयटम गीतों से बाज़ार को भर दिया है. नक़ल की इस दौड़ में 'दम मारो दम' गीत एक शर्मनाक उदाहरण प्रस्तुत करता है जो आने वाले कई वर्षों तक श्रोताओं के मन में मतली (vomit) करने की इच्छा उत्पन्न करता रहेगा. साथ ही साथ इसने श्रोताओं के दिल पे राज करने वाले 'हरे कृष्णा हरे राम' के मौलिक (original) 'दम मारो दम' गीत के साथ क्रूरतापूर्वक साहित्यिक बलात्कार भी किया है.

धन्य है वो गीतकार जिसने एक ही गीत में दो जघन्य अपराधों को इतनी सफाई से अंजाम दिया है. गीतकार के द्वारा पहले लिखे गए गीतों का मैं कायल रहा हूँ. पता नहीं किस मज़बूरी में आकर उसने ऐसे गीत की रचना की! कहीं उन्होंने श्री रामगोपाल वर्मा जैसे  दिग्गजों के साथ उठना बैठना तो शुरू नहीं कर दिया.


Aa.aa a..aw..
Aa..aaa..aa aww...


Hey..!!
Phir Dekh Raha Hai
Aaj Aankh Sek raha hai
Kal haath Seekega
Aaj Dheel Choda Raha hai
Kal Khud hi tokega
Aaj Mere liye Chair kheench raha hai
Kal Meri Skirt Kheenchega
Kheeche ga ki nahin ? hmm... ?

गीत की शुरुआत एक स्त्री द्वारा यौन संसर्ग के भूखे पुरुषों पर टिप्पणी से होती है. एक नज़र में लगता है कि ये शब्द पुरुष की मानसिकता का गहरा मनोवैज्ञानिक शब्द उजागर करते हैं. फिर अगले ही पल अहसास होता है कि वह स्त्री खुद ही ज़्यादा इच्छुक है. वह अपनी इच्छा का दायित्व पुरुष पर लादते हुए अपने भावनाओं को बड़े ही सस्ते और छिछोरे ढंग से व्यक्त करती है. पर धैर्य रखें! सस्तेपन और छिछोरेपन के इससे भी ज्यादा ऊंचे शिखर आगे के शब्दों में स्पर्श किये गए हैं. 

Aakkad bakkad Bambay bo
Aassi Nabbe Poore Sau
Sau rupaye ka Dum jo lun
Do sau gum ho udan Chhu

Phir kyun main tu
kar rahe Tain Tu....

इन शब्दों का न कोई मतलब है ना इस सन्दर्भ में सार्थकता. बस इतना पता चलता है कि नायिका की मनोवैज्ञानिक दशा बड़ी खराब है. नशा करके वो अपनी पीड़ा भूलने का प्रयत्न करती है.

Unche se uncha banda,
potty pe baithe nanga..
Phir kaahey ki society,
saali kaahey ka paakhanda..
Bheje se kaleje se, kaleje ke khaleje se
Mit jaaye hum, maroge toh jiyo bhi dum maaro dum.

ये शब्द घटियापन के माउंट एवरेस्ट हैं. कई लेखकों को लगता है कि मल, मूत्र और सेक्स से सम्बंधित बेमतलब की टिप्पणियाँ करने से उनके लेखन में गहराई आती है. उनके लेखन से ऐसा महसूस होता है कि सड़क की गंदी नाली खुद में समुद्र जैसी विशालता की  कल्पना कर बैठी है. पर सच्चाई यह है कि नाली में गोते लगाकर आप मोती नहीं पा सकते, सिर्फ पैर गंदे कर सकते हैं.
यहाँ गीतकार की बात से भी ऐसा ही लगता है. वो चाहता क्या है? यही कि ऊंचे बन्दे शौच में कपडे पहनकर बैठें? क्या इससे सोसायटी ज़्यादा प्रामाणिक और बेहतर बन जायेगी? क्या सोसायटी का पाखण्ड इससे कम हो जाएगा? शौच में नंगे बैठने से सोसायटी के पाखण्ड का क्या सम्बन्ध है - यह रहस्य कई श्रोताओं के सामने है.

Dum Maaro Dum
Mit Jaaye Ghum

Bolo Subha Shaam
Hare Krishna Hare Krishna
Hare Krishnaa
Hare Ram

Dum Maro Dum
Mit Jaye Gham
Bolo Subha Shaam
Hare Krishna..Hare Krishna
Hare Krishnaa

Hare Krishna..Hare Krishna
Hare Krishnaa
Hare Ram

Duniya ne hum ko diya kya?
Duniya se hum ne liya kya?
Hum sab ki parva karen kyun?
Sub ne hamaara kiya kya?

Aa aa..aaaa..aaa..a
aa..aaa...aaa..aaa

Dum Maaro Dum
Mit Jaye Gham
Bolo Subha Shaam
Hare Krishna..Hare Krishna
Hare Krishnaa..Hare राम

यहाँ हम पुराने 'दम मारो दम' गीत के शब्द सुनते हैं. थोड़ा आराम महसूस होता है. लगता है सूअर के बाड़े से निकलकर किसी साफ़-सुथरे बगीचे में आ गए हैं. यहाँ अंगरेजी के प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन द्वारा एक युवा लेखक पर की गयी टिप्पणी याद आती है - 'तुम्हारी रचनाएँ मौलिक भी हैं और बेहतरीन भी. पर जो हिस्सा मौलिक है वो बेहतरीन नहीं है. और जो हिस्सा बेहतरीन है वो मौलिक नहीं है.' ठीक उसी तरह इस गीत के जो शब्द अच्छे हैं वो मौलिक नहीं है, और जो शब्द मौलिक हैं वो अच्छे नहीं हैं.

Kya hai kahani Tere paap ki
Topi Hai pyare Har Naap ki
Khuli hai supermarket Baap Ki
Kya hai Pasand kaho aap ki

Andar ke bandar se ho Guftagu si ek baat
Thi jusjtu si ek baat
ho Guftgu si ek baat

फिर से इन शब्दों के साथ हम सूअर के बाड़े में प्रवेश करते हैं. इन्हें सुनकर लगता है मानो कोई सड़कछाप वेश्या किसी अय्याश अमीरजादे को उकसा रही है. कंडोम और पुरुष जननांगों के लिए बेहूदी उपमाओं का इस्तेमाल करके यहाँ गीतकार भद्दी अश्लीलता पर अपनी पकड़ को दर्शाता है. कभी-कभी तो लगता है कि कहीं वो हिन्दी अश्लील साहित्य के पुरोधा श्री मस्तराम का पुनर्जन्म तो नहीं! 

Phir kyun main tu
kar rahe Tain Tu....

Unche se uncha banda,
potty pe baithe nanga..
Phir kaahey ki society,
saali kaahey ka paakhanda..
Bheje se kaleje se, kaleje ke khaleje se
Mit jaaye hum, maroge toh jiyo bhi dum maaro dum.





Dum Maaro Dum
Mit Jaae Gam
Bolo Subah Shaam
Hare Krishna..Hare Krishnaa
Hare Krishnaa..Hare raam

Dum Maaro Dum
Mit Jaye Gham
Bolo Subha Shaam
Hare Krishna..Hare Krishna
Hare Krishnaa..

Hare Krishna..Hare Krishna.
Hare ram

Aa aa..aaaa..aaa..a

यहाँ फिर से हम गीत के शब्दों को सुनते हैं और मन ही मन शुक्रिया अदा करते हैं कि गीत ख़त्म हुआ. पर साथ ही एक प्रश्न की शुरुआत हमारे मन में होती है. हमारा संविधान मनुष्यों के साथ होने वाले बलात्कार पर कड़ी सज़ा देता है. पर साहित्यिक रचनाओं के साथ होने वाले बलात्कार पर कौन सजा देगा? 



कॉपीराईट: आलोक रंजन  alok160@gmail.com (कृपया लेखक का श्रेय चुराने का कष्ट ना करें)

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गब्बर सिंह' का चरित्र चित्रण: http://www.facebook.com/note.php?note_id=168951949816525
'मुन्नी बदनाम हुई' गीत की सप्रसंग व्याख्या: http://www.facebook.com/note.php?ote_id=161886377189749
'शीला की जवानी' गीत का भावार्थ: http://www.facebook.com/note.php?note_id=160894570622263
शीला की जवानी' का भावार्थ 'आयटम-आचार्य' की आवाज़ में सुनें!http://www.facebook.com/video/video.php?v=474080662539&comments
 अगर बाबा रणछोड़दास चांचड़ की जगह चुलबुल पांडे होते! http://www.facebook.com/note.php?note_id=181632775215109

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