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Tuesday, April 13, 2010

आकर्षण और साक्षात्कार



पाने की कोशिश में जो आकर्षण
पा जाने  में वो कभी नहीं
पाने पर मिलती सिर्फ रिक्तता
जिसकी कल्पना कभी की नहीं

जब चीज पास होती नहीं
हम पीछे दौड़ते जाते हैं
वो दिखती है जितनी कठिन
उतनी ही आकर्षक पाते हैं

यह आकर्षण भला या बुरा
योग्य-अयोग्य उचित-अनुचित
इस बात पर ध्यान न जाता
नहीं सोचते हित-अनहित

कई बार ऐसा होता है
असाधारण वस्तु होती निकट
तब हम उनका मोल न करते
ध्यान न देते, महत्त्व न देते

इसके विपरीत चीजें साधारण
जो होतीं दूर, दिखतीं अनमोल
उनकी चमक चुंधियाती आँखें
भले न उनमें कोई तौल

पा जाने पर खुलता रहस्य
वास्तविकता का मिलता अहसास
सोचते हम थे कितने मूढ़
पहेली न समझ पाए थे गूढ़

वस्तु के आकर्षण का
योग्यता से सम्बन्ध नहीं
आकर्षण तो आँखों में है
पीछे भागना सही नहीं

ध्यान देंगे तो पायेंगे
अच्छी चीजें होती सरल
शायद अनाकर्षक चमकहीन
पर उनका महत्त्व अचल.

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